Tuesday, 15 September 2015 | By: Ankur

“ खामोशी “

खामोशी
कभी खामोशी से हम उन्हें निहारा करते थे,

आज उनकी इक झलक को हमारे नयन तरसते है !!

  कभी खामोशी से हम उनकी परछाई से मिल आया करते थे,

आज उनकी आहट महसूस करने को भी हम तरसते है !!



  कभी खामोशी से हम उनकी बातें सुन आया करते थे,

आज उनकी आवाज़ सुनने को ये कान तरसते है !!

  कभी खामोशी से हम उन्हे निहारा करते थे,

ओर उनके रूप को अपनी रूह मे बसा लिया करते थे !!



  कभी खामोशी से हम इक पल मे जिंदगी जी लिया करते थे,

आज उस पल के इंतज़ार को जिंदगी रूलाती है !!

  कभी पलभर मे हम दिलभर के खुश हो लिया करते थे,

आज उस पल के इंतज़ार मे दिल खुश होने तरशता है !!

  

कभी खामोशी से हम तेरी सादगी देख लिया करते थे,

आज तुझे निहारने तक को नयन तरशते है !!

  कभी खामोशी से हम तुझे स्पर्श कर आया करते थे,

ओर उस लम्हे के आनंद को गौरवान्वित करते थे !!

 
कभी खामोशी से हम उन्हे निहारा करते थे,

आज उनकी इक झलक को हमारे नयन तरशते है !!  


                                                                                     लेखक

          अंकुर भार्गव

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